प्रारंभिक उत्तर िारत और इिके भिक्के (तीिरी शताब्दी ईिा पूि-षतीिरी शताब्दी ईस्िी)
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Highlights
यह पुस्तक प्रारंभिक उत्तर िारतीय भिक्कों के िमद्ृ ध और विशाल इततहाि का अिलोकन
करती हैऔर देश के आकर्षक अतीत की एक झलक पेश करती है। श्री देिेन्द्र हाण्डा रचित पुस्तक “प्रारंभिक
उत्तर िारत और इिके भिक्के (तीिरी शताब्दी ईिा पूि-षतीिरी शताब्दी ईस्िी)” िारतीय मुराशास्रीय
अध्ययन के िन्द्दिष में एक मील का पत्थर है। यह पस्ुतक, हहदं जु ा फाउं डेशन परुािशेर् िंग्रह के प्रबंधक
श्री मनीर् िमाष द्िारा अनुिाहदत है। यह उत्तर िारत के प्रारंभिक स्िदेशी ऐततहाभिक भिक्कों के िबिे बडे
िंग्रह पर ििाष करने िाली पहली व्यापक और िचिर कृतत है। तीिरी शताब्दी ईिा पूिष िे तीिरी शताब्दी
ईस्िी तक के ६०० िर्ों के इततहाि को िमाहहत ककये हुए यह पुस्तक गहराई और िटीकता के िाथ
प्रारंभिक उत्तर िारतीय स्थानीय भिक्कों के राजनीततक, आचथषक, िांस्कृततक और कलात्मक आयामों का
विश्लेर्ण करती है।
यह पुस्तक गंगा-यमुना दोआब, बाह्लीक, पंजाब, हरयाणा, हहमािल प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड के क्षेरों
िहहत उत्तर िारत के कई गणराज्यों, जनजाततय राज्यों और राजतंरों के भिक्कों का व्यिस्स्थत रूप िे
अिलोकन करती है।
“गंगा-यमुना दोआब के शािक: राजनीततक और िांस्कृततक गततविचध के एक महत्िपूणष कें र, मथुरा पर
विस्ततृ ध्यान हदया गया है। लेखक ने भमर और दत्त राजिंशों की ििाष की है, स्जनके शािकों— गोभमर,
ब्रह्मभमर और िूयभषमर ने देिी लक्ष्मी, मथुरा िक्षृ , श्रीित्ि, उज्जैन और नदी प्रतीकों िालेभिक्के जारी ककए।
विशेर् रूप िे ध्यान देने योग्य गोभमर का एक भिक्का है स्जिमें देिी के भिर के िारों ओर िबिे पुराना
ज्ञात प्रिामंडल दशाषया गया है, जो बाद में िारतीय कला में देखा गया एक प्रतीकात्मक निािार है।
कौशाम्बी क्षेर: हांडा ने क्षेर की मरुाशास्रीय विविधता को उजागर करते हुए ज्ञात और नए खोजेगए दोनों
भशलालेखों के िाथ भिक्के प्रस्तुत ककए हैं। स्जन शािकों पर ििाष की गई है उनमें बहृस्पततभमर द्वितीय,
राधाभमर, पोथभमर, जेठभमर, अस्ग्नभमर, िरुणभमर, अश्िघोर् और िपषभमर शाभमल हैं। उनके भिक्के कई प्रकार
के रूपांकनों को प्रदर्शित करते हैं। जहाँ जॉन एलन (1936) ने केवल बारह शासकों को सूचीबद्ध किया था,
वहीं श्री हाण्डा ने चालीस से अधिक शासकों के सिक्कों की पहचान की है और उनका चित्रण प्रस्तुत किया
है,जिनमें दमगुप्त, वंगपाल, वृषभमित्र, विश्वपाल, पुष्यमित्र, पुष्यसेन, चंद्रमित्र, इंद्रमित्र, रेवतीमित्र, विजयमित्र,
पृथिवीमित्र तथा यज्ञमित्र जैसे कई नए शासक शामिल हैं।
यह विस्तृत सूची पंचाल के राजनीतिक इतिहास और कालक्रम की हमारी समझ को काफी समृद्ध करती
है।
अन्य क्षेत्रीय सिक्के
पुस्तक निम्नलिखित मुद्राशास्त्रीय परंपराओं का भी अन्वेषण करती है: बाहिक क्षेत्र: महाभारत में वर्णित
बाहिक, सावित्रीपुत्र और मद्र जनजातियों के सिक्के ।
हिमाचल प्रदेश: औदुम्बर, त्रिगर्त, कुलुत, कुणिंद और वेमकी के सिक्के, जो एक जीवंत स्थानीय अर्थव्यवस्था
को दर्शाते हैं।
पंजाब और हरयाणा: मित्र, राजन्य और वृष्णि समूहों के सिक्के, और थेह पोलर और राजा कर्ण का किला
जैसे स्थलों से प्राप्त सिक्के ।
राजस्थानः आर्जुनायन, क्षुद्रक, उद्देहिक, मालव और शिबि वंश के सिक्के,जो इस क्षेत्र की गणतंत्रात्मक
विविधता को दर्शाते हैं।
उत्तराखंड (देवधरा) के सिक्के अल्मोड़ा और स्थानीय गढ़वाल शासक ।
यह पुस्तक किसी भी मुद्राशास्त्रीय पुस्तकालय, छात्रों, शोधकर्ताओं और सिक्का संग्राहकों के लिए एक अनिवार्य
पुस्तक है,जो दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक भारत की मुद्राशास्त्रीय विरासत पर व्यापक
नज़र डालती है।
“प्रारंभिक उत्तर भारत और इसके सिक्के” की अपनी प्रति आज ही प्राप्त करें और काल और मुद्रा के माध्यम
से भारत के महान प्राचीन मौद्रिक यात्रा का अनुभव करें ।
पृष्ठों की संख्या: XX+502
चित्रों की संख्या: 663, जिनमें 11 मानचित्र शामिल हैं।
प्रारूपः सजिल्द रंगीन
कागज़: 130 GSM
आकारः 13.25″ x 9.5″ inches
| Weight | 2.8 kg |
|---|---|
| Dimensions | 30 × 25 × 4 cm |
| Condition |
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